yatha raja tatha praja 2

रघुकुल रीति सदा चली आई,
प्राण जाए पर वचन न जाई.
ऐसे होते थे राजा,
और ऐसी ही होती थी प्रजा,
अब न राजा ऐसे रहे, न प्रजा,
जो जितना बेईमान वह उतना अच्छा राजा,
जो जितनी बेईमान वह उतनी अच्छी प्रजा,
कहावत फ़िर चरितार्थ हुई,
यथा राजा तथा प्रजा.

प्रजा ने लिया उधार बैंक से,
राजा ने कहा वापस मत करना,
समझना वोट की कीमत है,
मदद के नाम पर रिश्वत,
देता है राजा प्रजा को,
प्रगति की नई परिभाषा है यह.

पहले राजा मानते थे प्रजा को पुत्रवत,
अब मानते हैं एक वोट वत,
बाँटते हैं नफरत, मांगते हैं वोट,
सच्चाई इमानदारी पर करते हैं चोट.

प्रजा ने टेक्स दिया राजा को,
राजा ने खर्च किया ख़ुद पर,
विकास कार्यों मैं पाँच पैसे,
पंचान्वें अपनी जेब मैं.

बना दिया बाज़ार राष्ट्र को,
भूल गए अपना इतिहास,
खेतों मैं फक्ट्री लगाईं,
फसलों को करके बरबाद.

जब बच्चे थे तब पढ़ते थे,
कृषि प्रधान देश है भारत,
अब बूढ़े हो कर पढ़ते हैं,
कंक्रीट का जंगल भारत.