एक सुझाब है मेरा

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भाजपा नेता अडवानी द्वारा 'भारत रत्न' के लिए अटल जी के नाम का प्रस्ताव करते ही जैसे प्रस्तावों की वाढ आ गयी. हर पार्टी ने अपने अपने नेताओं के नाम का प्रस्ताव करना शुरू कर दिया. एक अजीब सा माहौल पैदा हो गया. सरकार के सामने अटल जी के नाम के प्रस्ताव से जो परेशानी आ गई थी वह दूर हो गई. इतने ज्यादा नामों को देखकर अब यह कहा जाने लगा है की पिछले वर्षों की भांति इस वर्ष भी 'भारत रत्न' किसी को न दिया जाए.

कैसी विडंबना है हमारे देश की कि हर नेता सिर्फ़ लेने की बात करता है. देने को न उनके पास कभी था और न हे. अगर कुछ था भी तो वह उसे देश और जनता को देने की हिम्मत नहीं जुटा पाए. आज़ादी की जंग की खूब कीमतें बसूली इन नेताओं ने. जो आज़ादी के असली सिपाही थे वह या तो फांसी पर लटक गए या आज़ादी के बाद कहीं खो गए. सामने आकर कुर्सिओं पर जम गए वह लोग जिनका एक बाल भी बांका नहीं हुआ अंग्रेजों के जुल्म से. कुर्सी को अपनी व्यक्तिगत पारिवारिक जायदाद बना लिया इन लोगो ने. वाप मरता है तो बेटा जम जाता है कुर्सी पर. बेटा नहीं तो बेटी, बीबी या फ़िर वहू. हर हालत मैं कुर्सी अपने खानदान मैं ही रहनी चाहिए. कुछ परिवारों ने सारे देश को आपस मैं बाँट लिया है.

मेरा एक सुझाब है. एक क़ानून बनाया जाए. हर पार्टी के नेता को 'भारत रत्न' दिया जायेगा और नेताओं के अलावा किसी को नहीं दिया जायेगा. नेता जिन्दाबाद. जनता मुर्दाबाद.


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